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महोदय, समाज कल्याण संस्थाओं का काम बहुत बड़े परिमाण में बढ़ा है। आजकर इसके लिए अनुदान भी पहले से कहीं अधिक दिए जाते हैं। हर पंचवर्षीय योजना में हम इस पर अधिकाधिक धन खर्च करते हैं और आजकल समाज कल्याण का कार्य करने वाले पूर्णकालिक कार्यकर्ता भी पहले से बहुत अधिक हैं। लेकिन मैं ऐसा अनुभव करती हूं कि जैसे-जैसे हमारे व्यय और कार्यक्रम बढ़ते जाते हैं, वैसे-वैसे इस काम में व्यक्तिगत उत्साह और लगन की भावना घटती जाती है।

अध्यक्ष महोदय ने मिशनरी भावना का उल्लेख किया और मैं भी अनुभव करती हूं कि आज वह नहीं है। मैं यह केवल बोर्ड के बारे में ही नहीं, बल्कि सामाजिक कार्य के समस्त क्षेत्र के बारे में कह रही हूं। फिर स्वेच्छा से सेवा के प्रयास भी कुछ कम होते जा रहे हैं।

ऐसा भी होता है कि जब विचार संस्थाबद्ध हो जाते हैं, तो उनमें कुछ-न-कुछ आशय युक्त काम करने की भावना आ जाती है। यह मनुष्य का स्वभाव है किंतु सारे सामाजिक कार्य का लक्ष्य तो उसी संवेदन के अभाव और निस्वार्थता पर संदेह के परिणामों से लड़ना है जिसकी कि प्रायः मानव स्वभाव कहकर अनदेखी कर दी जाती है। मैं जानती हूं कि जिस मिशनरी भावना से काम शुरू किये जाते हैं, उन्हें बाद में उसी तरह बनाये रखना हमेशा संभव नहीं होता लेकिन बेहतर संगठन खड़ा हो जाने के बाद समस्याओं के बेहतर हल निकलने चाहिए। अतः हमें केवल अनुदानों से ही संतोष नहीं कर लेना चाहिए बल्कि यह ध्यान रखना चाहिए कि इस सामाजिक कार्य के पीछे जिससे कि सामाजिक परिवर्तन हो रहा है, उद्देश्य क्या है? बोर्ड सामाजिक रूपांतर का केवल साधन मात्र है। राजनीतिक और आर्थिक कामों में फंसे रहने के कारण हम सही दिशा में और सोद्देश्य सामाजिक परिवर्तन की ओर काफी ध्यान नहीं दे पा रहे हैं किन्तु परिवर्तन तो हमारे अपने विकास और विश्व की घटनाओं के कारण, जो हमारे जीवन और समाज पर निरन्तर प्रभाव डालता है। स्वतः आ रहा है। हमारे होनहार युवक और युवतियां समाज के घटनाचक्र से निरन्तर प्रभावित है और संसार में कहीं भी कुछ भी होता है तो वह हमें भी अवश्य छू जाता है। लेकिन परिवर्तन का इस प्रकार केवल उपोत्पाद के रूप में या अप्रत्यक्ष रूप में आना पर्याप्त नहीं। हमारी अपनी अनेक समस्याएं हैं जो हमारे अनुभव की दृष्टि से विशेष प्रकार की हैं।

महोदय एक उदाहरण है जो बोर्ड के सीधे कार्यक्षेत्र में नहीं आता है, फिर भी, वह है सामाजिक अपव्य्य को रोकने का। विवाहों और भोजों आदि में जो धन का अपव्यय होता है वह घटने के बजाय बढ़ रहा है। विकास से जिन लोगों को लाभ पहुंचा है वे दूसरों पर अपनी सफलता का रोब गांठना चाहते हैं। दहेज का विरोध जो कुछ समय पहले काफी ज्वलंत प्रश्न था, पीछे पड़ गया है यद्यपि यह कुरीति आज भी उसी तरह जीवित है। अस्पृश्यता के बारे में आज कानून मौजूद है लेकिन आज भी बहुत से स्थानों पर यह बुराई फैली हुई है। लोग इसे सरकार पर नहीं छोड़ सकते कि वह ही इसे हटाने के लिए कदम उठाए। इसके लिए तो उन्हें स्वयं कुछ न कुछ करना होगा। विशेष रूप से समाज कल्याण के क्षेत्र में केवल सरकारी कार्यवाई पर्याप्त नहीं हुआ करती। जनता और सरकार दोनों को मिलकर एक-दूसरे का हाथ मजबूत करना चाहिए और पूरे अधिकतम सहयोग से काम करना चाहिए।

अपने कार्यक्रमों को पूरा करने के अतिरिक्त समाज कल्याण संगठनों को भी अंधविश्वासों से लड़ने और लोगों में तर्कसंगत दृष्टिकोण अपनाने की ओर भी ध्यान देना चाहिए। समाज सेवी संस्थाएं दैनिक जीवन में वैज्ञानिक चिन्तन को लोकप्रिय बनाने के लिए आज बहुत कुछ कर सकती है। जाति या समाज के नाते हम लोगों को स्वास्थ्य और शिक्षा की ओर कहीं अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। इसके लिए आवश्यक है सही वातावरण, सही आदतें सामाजिक दृष्टि ताकि हमें अपने व अपने आस-पास के लिए उचित सफाई बेहतर और स्वास्थ्यवर्धक पोषाहार और स्वास्थय की सुविधायें प्राप्त हो सकें।

सफाई के बारे में तो हमारा कुछ अजीब ही दृष्टिकोण है। हम अपने घर की सफाई तो करते हैं पर कूड़ा करकट दरवाजे पर ही डाल देते हैं। हम स्वयं तो रोज नहाते हैं पर हमारी सड़क या हमारी गली गंदी है इसकी तनिक भी चिन्ता नहीं करते। बड़े शहरों में और विशेषकर उन इलाकों में जहां पढ़े-लिखे और खाते-पीते लोग रहते हैं, कूड़ा-करकट इकट्ठा रहता है और कोई भी इसकी परवाह नहीं करता। स्पष्ट रूप से यह स्त्रियों की संस्थाओं और समाज कल्याण संगठनों का कार्य है। समाज कल्याण संस्थाओं के लिए परम आवश्यक है कि वे समूचे क्षेत्र ेक सुधार के लिए आपसी तालमेल रखें। सरकारी विभागों का आपसी तालमेल भी नितान्त आवश्यक है जिससे स्थिति सुधर सकती है। इसके लिए सर्वप्रथम हमें अपने समाज के ढांचे को बदलना पड़ेगा।

हमारे यहां अमीरी और गरीबी चली आती है। हमारे देश में एक गहरी खाई चली आती है। आज भी समाज में अमीरी और गरीबी के बीच में अंतर बहुत ज्यादा है और इसका गलत लाभ उठाया जाता है। जब हम जनता के राज में विश्वास करते हैं और अपने यहां जनता का राज स्थापित कर चुके हैं और जब कि देश में गरीबी है और उसका गलत लाभ भी उठाया जाता है। तब सहकारिता की बहुत आवश्यकता है और इसे लागू करने में समाज सेवी संस्थाएं बहुत बड़ा योगदान दे सकती हैं। स्टॉप