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सभापति जी, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के समय दो नारे हमारे देशवासियों को सुनने को मिले। एक लखनऊ से और दूसरा इन्दौर से। लखनऊ में तिलक ने यह नारा लगाया कि स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और इन्दौर से हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष पद से महात्मा गांधीजी ने कुछ समय पश्चात् ही यह नारा लगाया कि हिन्दी का प्रश्न स्वराज्य के प्रश्न से कहीं अधिक बड़ा है।

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सभापति जी, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के समय दो नारे हमारे देशवासियों को सुनने को मिले। एक लखनऊ से और दूसरा इन्दौर से। लखनऊ में तिलक ने यह नारा लगाया कि स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और इन्दौर से हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष पद से महात्मा गांधीजी ने कुछ समय पश्चात् ही यह नारा लगाया कि हिन्दी का प्रश्न स्वराज्य के प्रश्न से कहीं अधिक बड़ा है। आगे चल कर ये दोनों नारे साथ साथ मिलकर चले और भारतीय स्वाधीनता संग्राम के दोनों ही अंश बन गए।

श्रीमन्, यह देश का सौभाग्य था कि जो साहित्यिक क्षेत्र में नेता थे, वही नेता राजनीति की बागडोर भी अपने हाथ में लेकर चल रहे थे। इसका सुपरिणाम यह हुआ कि जब देश स्वतंत्र हुआ और जब स्वतंत्र होने के पश्चात् देश की राजभाषा बनाने का निर्णय होने लगा तो उसी पृष्ठभूमि पर हमने यह निश्चय किया कि स्वाधीन भारत में 15 वर्षों के पश्चात् हिन्दी राजभाषा घोषित की जाएगी। हिन्दी साहित्य सम्मेलन को राष्ट्रीय महत्व की संस्था घोषित करते समय मुझे लगता है कि सरकार के सामने दो दृष्टिबिन्दु थे। एक तो इसलिए उन्होंने यह मार्ग चुनना स्वीकार किया कि हिन्दी साहित्य सम्मेलन की प्रबन्ध समिति में बहत अव्यवस्था फैल गयी थी। हिन्दी साहित्य सम्मेलन अपने मार्ग से और अपने उद्देश्य से भटक गया था। पर्याप्त दिनों तक प्रतीक्षा की गई कि हिन्दी साहित्य सम्मेलन के कार्यकर्ता कुछ सावधानी और समझदारी से काम लेंगे लेकिन जब वे ऐसा नहीं कर पाये तो विवश होकर सरकार को इस प्रकार की व्यवस्था करनी पड़ी। दूसरी चीज यह है कि सरकार ने संविधन में हिन्दी को राजभाषा के पद पर आसीन करने के लिए यह निश्चय किया कि वह इस कार्य को अपने हाथ में ले और हिन्दी की प्रगति को आगे बढ़ाये। सराकर द्वारा राज्य सरकारों के सहयोग से एक कार्यक्रम तैयार किया जाएगा और उसको शीघ्र कार्यान्वित किया जाएगा ताकि वह इसको आधुनिक ज्ञान के संचार का प्रभावी माध्यम बना सके। एकता की भावना के संवर्धन तथा देश के विभिन्न भागों में जनता में संचार की सुविधा हेतु यह आवश्यक है कि भारत सरकार द्वारा सब राज्यों के परामर्श से तैयार किये गए त्रिभाषा सूत्र को सभी राज्यों में पूर्णतः कार्यान्वित करने के लिए प्रभावी उपाय किया जाना चाहिए।

यह सभा संकल्प करती है कि हिन्दी भाषी क्षेत्रों में हिन्दी तथा अंग्रेजी के अतिरिक्त एक और भारतीय भाषा को दक्षिण भारत की भाषाओं में से किसी एक को तरजीह देते हुए हिन्दी और हिन्दी भाषी क्षेत्रों में प्रादेशिक भाषाओं एवं अंग्रेजी के साथ साथ हिन्दी के अध्ययन के लिए उस सूत्र के अनुसार प्रबन्ध किया जाना चाहिए। यह बात स्पष्ट होनी चाहिए कि किसी का मंतव्य यह नहीं है कि अंग्रेजी को शिक्षा के क्षेत्र से ही बहिष्कृत कर दिया जाए अपेक्षा तो इस बात की है कि हमारे कार्य के लिए अंग्रेजी के प्रयोग की अनिवार्यता न रहा जाए। उपयोग की दृष्टि से भी अंग्रेजी वैकल्पिक भाषा के रूप में पढ़ी जाती रहेगी। अंग्रेजी का स्थान भारतीय भाषाओं को देने से कार्य सरल हो जायेगा तथा भाषा विषयक खाई भी शीघ्र पट जाएगी। अंत में तो कार्य हिन्दी में करना ही है परन्तु यह स्थिति एकदम नहीं आ सकती है अतः अन्तरिम काल में सुप्रीम कोर्ट में तथा हाई कोर्ट में हिन्दी तथा अंग्रेजी दोनों का प्रयोग होना चाहिए। किन्तु अहिन्दी भाषी राज्यों के हाई कोर्टों में वहां की प्रादेशिक भाषाओं का प्रयोग भी किया जा सकता है तथा सब जगह एक भाषा से दूसरी भाषा में अनुवाद करने की पूरी व्यवस्था भी हो। अन्त में राजकीय क्षेत्र में अंग्रेजी भाषा हटाई जा सकेगी तथा भारतीय भाषाओं का प्रयोग होने लगेगा।

दिसम्बर 1967 में संसद के सामने जब राजभाषा संशोधन विधेयक पर विचार हुआ था तब उसके साथ ही हिन्दी के विकास और प्रचार प्रसार, विद्यालयों में हिन्दी के अध्ययन, सरकारी नौकरियों में प्रवेश पाने के लिए भाषा ज्ञान की स्थिति आदि के विषय में एक सरकरी संकल्प पर भी विचार हुआ था। विधेयक के साथ साथ वह संकल्प जिस रूप में राज्यसभा और लोकसभी द्वारा पारित हुआ, उससे सरकारी नीति की अधिकृत जानकारी हम सब को मिलती है और हिन्दी के राजकाज में प्रयोग के बारे में स्थिति स्पष्ट हो जाती है। संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार संघ की राजभाषा हिन्दी है और उसके अनुच्छेद 351 के अनुसार हिन्दी भाषा का प्रसार, वृद्धि और उसका विकास करना ताकि वह सम्पूर्ण भारत की सामाजिक संस्कृति के सब तत्वों की अभिव्यक्ति का सर्वसम्मत माध्यम हो सके, संघ का कर्तव्य है। यह सभा संकल्प करती है कि हिन्दी भाषा के प्रसार एवं विकास की गति बढ़नी हेतु तथा संघ के विभिन्न राजकीय प्रयोजनों के लिए उत्तरोत्तर इसका प्रयोग हेतु+1 भारत सरकार और द्वारा एक अधिक गहन एवं व्यापक कार्यक्रम तैयार किया जाएगा और उसे कार्यान्वित किया जाएगा और उसके लिए किये गए या किये जाने वाले उपायों एवं की गई प्रगति की विस्तृत वार्षिक मूल्यांकन रिपोर्ट संसद के दोनों सदनों के पटल पर रखी जायेगी और सभी राज्य सरकारों को भेजी जाएगी। संविधान की आठवीं अनु सूची में हिन्दी के अतिरिक्त भारत की 14 मुख्य भाषाओं का भी उल्लेख किया गया है और देश की शैक्षणिक और सांस्कृतिक उन्नति के लिए यह आवश्यक है कि इन भाषाओं के पूर्ण विकास के लिए सामूहिक उपाय किये जाने चाहिए। तभी हिन्दी राष्ट्रभाषा बन सकती है।

यह सभा संकल्प करती है कि हिन्दी तथा सभी भारतीय भाषाओं का समन्वित विकास हो। सभी भारतीय भाषाओं को एकदूसरे के निकट लाने के लिए देवनागरी लिपि को सामान्य माध्यम बनाया जाएगा। इसके साथ ही साथ अभी कुछ दिन पूर्व जब राष्ट्रीय एकता सम्मेलन हुआ था, तो उसमें भी जब यह प्रश्न उपस्थित हुआ कि उत्तर भारत के व्यक्तियों को दक्षिण भारत की एक या दो भाषाएं अवश्य सीखनी चाहिए तो उस समय भी मैंने इस प्रश्न को उठाया था कि क्या यह आवश्यक होगा कि जब किसी दूसरी भाषा को सीखा जाये तो लिपि की दीवार बीच में कायम रखी जाये। उस समय अन्य भाषा भाषियों ने भी इस सुझाव को बड़ी प्रसन्नता के साथ स्वीकार किया था।

 

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