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सभापति महोदय, अपने खेत में खेती करने के बाद साल के अंत में किसान की फसल नष्ट हो जाये तो उसे हताशा के सिवाय कुछ हाथ नहीं लगता है

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सभापति महोदय, अपने खेत में खेती करने के बाद साल के अन्त में किसान की फसल नष्ट हो जाये तो उसे हताशा से सिवा कुछ हाथ नहीं लगता। जो किसान देश के लिए अनाज पैदा करता है, उनकी मजदूरी को राष्ट्रीय सेवा मानकर उनके परिवार के एक सदस्य को सौ दिन का रोजगार सरकार की ओर से दिया जाय। यदि आप इस प्रकार की कुछ योजना बनाते हैं तो निश्चित रूप से उसे रोजगार की गारण्टी मिलेगी। कुछ पैसा उनके घरों में जायेगा। इससे वे बहुत ज्यादा मेहनत करेंगे, ज्यादा लगन से काम करेंगे और उसे लगेगा कि सरकार मेरी मेहनत का ध्यान रखती है और वह उसे एक सेवा के रूप में मानती है। यदि इस प्रकार की कोई योजना आप बनाते हैं और छोटे और मंझोले किसानों को सीधा फायदा मिल सकती है। ऐसी योजना पर विचार करने की आवश्यकता है इसलिए इस ओर मंत्री जी विशेष रूप से ध्यान देने की कृपा करें और उनके लिए कुछ विशेष कदम उठायें।

सभापति जी लाभ के पद के कानून में संशोधन करने वाला विधेयक जब पहली बार सदन में आया, तब भी हमने उस विधेयक का विरोध किया था और आज भी हम उसका विरोध करने के लिए खड़े हुए हैं। उस समय हमने सदन को यह चेतावनी दी थी कि दुर्भाग्यवश आज देश की आम जनता में सरकार के बारे में जो सोच है, उस के बारे में मैं यहां कहना चाहता हूं। इस देश की जनता के मन में आज सरकारों पर विश्वास नहीं रहा है। सरकारों की विश्वसनीयता धीरे-धीरे कम होती जा रही है। यदि हम इस विधेयक को पारित करें तो शायद इस संसद की विश्वसनीयता भी खत्म हो जायेगी । मुझे लगता है जो आशंका हमने इस सदन में उस विधेयक पर चर्चा के समय जताई, महामहिम राष्ट्रपति जी के मन में भी यही  विचार आये होंगे। दोनों सदनों द्वारा पारित किये हुए विधेयक को जब महामहिम के पास भेजा गया तो उन्होंने इस विधेयक को संसद के सामने पुनर्विचार के लिए वापस भेज दिया। मैं समझता हूं कि जब महामहिम राष्ट्रपति जी किसी विधेयक को पुनर्विचार के लिए भेजें तो इसका अर्थ यह निकलता है कि महामहिम राष्ट्रपति जी उससे सहमत नहीं है। जो तर्क यहां मंत्रीजी ने दिये थे और यहां हमारे  साथियों ने भी वही बातें कही थीं कि बड़ों को बचाने के लिए ही हम यह पाप कर रहे हैं।

सभापति महोदय, जब यह विधेयक पहली बार सदन में आया, तब मैंने प्रशासन से मांग की थी कि संस्थाओं को इस लाभ के पद के कानून के दायरे से बाहर किया जाएगा, उसमें कौने से सांसद लाभ के पदों पर हैं? चाहे वे लोकसभा के हों या राज्यसभा के हों। जो सांसद लाभ के पद पर आसीन हैं, यदि उस लाभ के पद को कानून के दायरे से बाहर नहीं किया जाता है तो वे सांसद कानून की पकड़ में आयेंगे। यदि कोई सांसद न्यायालय में जायेगा तो न्यायालय निश्चित रूप से उनके खिलाफ जाएगा ।

महोदय, पहले के विधेयक में सरकार ने लिखा है कि यदि हम ऐसा नहीं करते तो लगभग 45 सांसद ऐसे हैं जहां पर पुनर्चुनाव कराने पड़ेंगे। इसका अर्थ क्या होता है, यह कानूनी मामला होगा। ये मामला न्यायालय में जाएंगे और उन जगहों पर हमें बाई इलेक्शन करने होंगे जो देश की आर्थिक स्थिति के लिए सही नहीं है। यह सरकार ने अपने विधेयक में कहा है। अभी उस विधेयक की कापी मेरे पास नहीं हैं नहीं तो मैं उसे आपको पढ़कर सुना देता। आपने विधेयक के कारण और उद्देश्यों में कहा है कि वहां पर बाई इलेक्शन कराने पड़ेंगे इसलिए हम और यह सदन जानना चाहता है कि सदन के साथ जिस जनता के हम प्रतिनिधि हैं, जिस जनता ने हमें अपना प्रतिनिधित्व करने के लिए यहां भेजा है, वह जान पाये कि वे कौन से सांसद हैं, जिनके लिए हमारे पास केवल बहुमत है और बहुमत के बल पर सत्ता का दुरुपयोग करके हम इस प्रकार का विधेयक लाकर बड़ों को बचाने का पाप इस सदन में कर रहे हैं। कम से कम वह सूची तो सदन के सामने रखी जाए लेकिन वह सूची भी सदन के सामने नहीं रखी गई है।

महोदय, जब माननीय मंत्री जी यहां बोल रहे थे, तब मैं उसे सुनकर थोड़ा हैरान हो रहा था। उन्होंने कई तर्क दिये । मैं उनको जवाब या सफाई देने के लिए यहां नहीं खड़ा हुआ हूं लेकिन मुझे इस बात का आश्चर्य हुआ कि हमारे देश में संसदीय लोकतंत्र है, हमारी संसदीय कार्य प्रणाली है और सारा देश इस संसद का अनुकरण करता है। मैंने पहली बार यहां सुना कि हमारे मंत्री जी कानून के विद्वान हैं। वे हमें यहां से संदेश दे रहे थे कि अब हमें कर्नाटक और झारखंड का अनुकरण करना चाहिए। सर्वोच्च संसद का अनुकरण राज्य विधानसभाओं को करना चाहिए।

श्रीमान्, यहां पर हम यह शिक्षा दी गई है कि हमें अब राज्य विधान सभाओं का अनुकरण करना चाहिए। अगर वे सही हैं तो हम भी अपनी जगह सही हैं और यदि वे गलत हैं और यदि आप उनका अनुसरण करते हैं तो गलत है। मैं आपके माध्यम से मंत्री जी को प्रार्थना करूंगा कि आपने आज सदन में जो भी कहा, आप रात में अपने इस वक्तव्य को पढ़ें। आप इसे पढ़कर अपने आप पर हंसेंगे। यह मुद्दा हमारे वाद-विवाद का नहीं है। हम किसका अनुसरण करना चाहते हैं? यदि झारखंड ने जो किया तो वह गलत है और यदि कर्नाटक में जो हुआ वह भी गलत है तो हम सदन में क्या कर रहे हैं?

महोदय, यहां संविधान के अनुच्छेद 102 और 103 का जिक्र किया गया है। संविधान ने हमें यह अधिकार दिया है और आप सदन को कोई नई बात नहीं बता रहे थे। आपको उस कानून में संशोधन का पूरा अधिकार है लेकिन उसे संशोधित करने का आपका तरीका गलत है। जिन सदस्यों या संस्थाओं को हम अब उसके दायरे से बाहर कर रहे हैं, वे संस्थाएं कब से हैं? लाभ के पद का कानून कब से अस्तित्व में है? आज इसमें दोनों सदनों के 45 सदस्य शामिल हैं लेकिन जब उन सदस्यों की नियुक्ति की गई, तब उनको जानकारी नहीं थी कि हमारे देश में लाभ के पद का कानून भी है और हम उसका उल्लंघन कर रहे हैं।

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