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80 शब्द प्रति मिनट शार्टहैण्ड डिक्टेशन उत्तर प्रदेश अधीनस्थ सेवा चयन आयोग आशुलिपिक परीक्षा (UPSSSC  Steno)

र्तमान युग विज्ञान का युग है और प्राचीन युग अध्यात्मवादी था। स्थिति यह है कि मनुष्य न तो अध्यात्म को ही पचा पा रहा है और न पूरी तरह विज्ञान को ही अपना पा रहा है। कारण विज्ञान भौतिक सुविधाएं तो देता है परंतु शांति नहीं दे पा रहा है। जहां तक अध्यात्म का प्रश्न है उससे शांति तो मिलती है पर जीवन समय से  पीछे छूट जाता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि दोनों में सामंजस्य हो जो हो नहीं पा रहा है।

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वर्तमान युग विज्ञान का युग है और प्राचीन युग अध्यात्मवादी था। स्थिति यह है कि मनुष्य न तो अध्यात्म को ही पचा पा रहा है और न पूरी तरह विज्ञान को ही अपना पा रहा है। कारण विज्ञान भौतिक सुविधाएं तो देता है परंतु शांति नहीं दे पा रहा है। जहां तक अध्यात्म का प्रश्न है उससे शांति तो मिलती है पर जीवन समय से  पीछे छूट जाता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि दोनों में सामंजस्य हो जो हो नहीं पा रहा है। यही कारण है कि मनुष्य और उससे निर्मित समाज उस मध्य पौराणिक चरित्र त्रिशंकु की हालत में हो गया है जो न तो स्वर्ग ही पा सका और न धरती पर ही लौट सका। व्यक्ति और समाज परस्पर संबंधित है । व्यक्ति के बिना समाज का और समाज के बिना व्यक्ति का न तो कोई मूल्य है और न कोई अर्थ ही है। व्यक्ति रहित समाज एक शून्य की तरह होता है जहां मौत के सन्नाटे के अलावा और कुछ भी नहीं है। यहीं स्थिति व्यक्ति की है। यदि वह समाज से कट जाता है तो वह समाज कंटक और आत्म-हंता बन जाता है। स्पष्ट शब्दों में व्यक्ति को समाज की और समाज को व्यक्ति की आवश्यकता पड़ती है। ये दोनों ही एक-दूसरे के बिना व्यर्थ, निःसार और अर्थहीन होकर समाजघाती व आत्महंता स्थितियों को विकसित करते हैं।

मनुष्य केवल भूख और कामवासना की पूर्ति मात्र से ही संतुष्ट होने वाला जीव नहीं है। यदि कोई उसे यह चारा डालता है तो उसकी पूर्ण संतुष्टि नहीं हो पाती है। यूं भी भूख और भोग से ही संतुष्ट होना पशुधर्म है, मानव-धर्म नहीं। मनुष्य और पशु में पर्याप्त अंतर है। मनुष्य इन उपर्युक्त वासनाओं से ऊपर उठकर विवेक से भी काम लेना चाहता है। अतः उसे भोग की अपेक्षा ज्ञान अर्जन की भी आवश्यकता होती है। करुणा अपना बीज अपने आलम्बनों या पात्रों में नहीं फेंकती है। अतः जिस पर करुणा की जाती है वह बदले में करुणा नहीं करता। जैसा कि क्रोध और प्रेम में होता है। बल्कि कृतज्ञ होता है अथवा श्रद्दा या प्रीत करता है। बहुत सी औपन्यासिक कथाओं में यह बात दिखाई गई है कि युवतियां दुष्टों के हाथ से अपना उद्धार करने वाले युवकों के प्रेम में फंस गई हैं। कोमल भावों की योजना में बांग्ला के सामाजिक उपन्यास  लेखक करुणा और प्रीति के मेल से बड़े ही प्भावोत्पादक दृश्य उपस्थित करते है। करुणा अपना बदला नहीं चाहती। करुणा से करुणा उत्पन्न होती नहीं है अपितु कृतज्ञता उत्पन्न होती है।

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