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मनुष्य को जीवन में हार-जीत, यश अप-यश, संपन्नता-विपन्नता आदि सभी को झेलना पड़ता है। सुख के साथ दुख भी होता है लेकिन यदि मनुष्य का मन दुख और असफलता से निराश हो जाता है तो वह कभी भी प्रगति नहीं कर सकता।

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मनुष्य को जीवन में हार-जीत, यश अप-यश, संपन्नता-विपन्नता आदि सभी को झेलना पड़ता है। सुख के साथ दुख भी होता है लेकिन यदि मनुष्य का मन दुख और असफलता से निराश हो जाता है तो वह कभी भी प्रगति नहीं कर सकता। यदि अभाव तथा विपन्नता में व्यक्ति का मन टूट जाता है, पराजय उसे कुंठित कर देती है, तो वह भी उन्नति नहीं कर सकता है, क्योंकि किसी भी कार्य के संपादन और सफलता के लिए मन एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। 

मन यदि सशक्त है तो मनुष्य प्रतिकूल परिस्थितियों में भी बड़े से बड़े तथा असाध्य से असाध्य कार्य को भी कर ले सकता है। कभी-कभी निर्धन, निर्बल और साधनहीन व्यक्ति को भी सफल होते देखा गाय है इसके विपरीत साधन-संपन्न, प्रबल व्यक्ति को भी असफल होते। सत्य यह है कि मनुष्य की सफलता-असफलता, जय-पराजय प्रमुखतः उसके मन की सशक्तता पर निर्भर करती है। 

कोई भी भाषा बुरी नहीं होती, क्योंकि सबकी अपनी-अपनी विशेषताएँ  होती हैं। हर भाषा जबकि किसी अन्य के लिए केवल भाषा होती है तो अपने लिए मातृभाषा होती है। अतएव किसी भाषा अथवा किसी भी मातृभाषा को बुरा मानना या समझना अपने से हेय-हीन मानना-समझना मनुष्यता नहीं, विद्या प्रेम नहीं प्रत्युत नीचता और संकीर्णता है। 

हर भाषा का अपना साहित्य भी होता है और उस साहित्य की अपनी विशिष्टता होती है। उस विशिष्टता में किसी भी देश की मानसिक विलक्षणता रहती है। इस सारी बातों की जानकारी के लिए ही विदेशी भाषाओं का अध्ययन होता है। अनेक भाषाओं का ज्ञान आवश्यक है क्योंकि इससे मानवीय दृष्टि व्यापक, विचार उदार और अंतर्राष्ट्रीय संबंध दृढ़ होते हैं। इसलिए विदेशी या दूसरी भाषा का विद्यार्थी होना अनुचित नहीं है। लेकिन विदेशी या दूसरी भाषाओं के पढ़ने पहल अपनी राष्ट्र-भाषा और मातृभाषा का ज्ञान होना नितांत आवश्यक है। अपनी भाषा में हृदय बोलता है, इसमें माँ की ममता, राष्ट्रीय संबंधों की मधुरता और अपने को जानने-पहचानने की सरलता रहती है, अपनापन रहता है। इसको सीखने के लिए हमें विशेष श्रम नहीं करना पड़ता है। 

हिन्दी भारत-वर्ष की आधी से अधिक जनता की मातृभाषा तथा देश की राष्ट्र-भाषा है। इसी में हम अपने मन की बात सोचते हैं, किसी विदेशी भाषा में नहीं। वह हमारे लिए सहज और सुबोध है। अतएव विदेशी भाषा सीखी जा सकती है लेकिन वह अपनी नहीं हो सकती क्योंकि हमारी अभिव्यक्ति को सहज-वाणी नहीं प्रदान कर सकती। विदेशी भाषा मस्तिष्क की वस्तु हो सकती है, हमारे हृदय की वाणी नहीं हो सकती। 

वाक्यांश
  • प्रगति नहीं कर सकता
  • नहीं कर सकता है
  • कर ले सकता है
  • निर्भर करती है
  • भारत-वर्ष
  • विदेशी भाषा
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कठिन शब्द
  • हार-जीत
  • यश-अपयश
  • संपन्नता-विपन्नता
  • विपन्नता
  • कुंठित
  • संपादन
  • जय-पराजय
  • मातृभाषा
  • संकीर्णता
  • हेय-हीन
  • विशिष्टता
  • अपनापन
  • सुबोध
  • अभिव्यक्ति
  • सहज-वाणी

 

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