120 शब्द प्रति मिनट की गति से यह शार्टहैण्ड डिक्टेशन SSC Stenographer Grade C & D Exam और High Court Steno/PA Exam Skill test के लिए बहुत महत्वपूर्ण है. एसएससी स्टेनोग्राफर्स एग्जाम 2014 के स्किल टेस्ट में यह डिक्टेशन दिया गया था। 120 WPM Hindi shorthand Dictation for SSC Stenographer, 120 wpm shorthand dictation वाक्यांश व आउटलाइन के साथ

सभापति महोदय, अभी दो दिन पूर्व राज्यसभा में सदस्यों ने इस बात के लिए सरकार को दोषी ठहराया था कि वह हरिजनों की रक्षा के काम में असफल रही है। हो सकता है, कि इस आरोप के पीछे कुछ सदस्यों का राजनीतिक उद्देश्य हो, किंतु इससे आरोप को बिल्कुल बे-बुनियाद नहीं कहा जा सकता और उसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती।

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सभापति महोदय, अभी दो दिन पूर्व राज्यसभा में सदस्यों ने इस बात के लिए सरकार को दोषी ठहराया था कि वह हरिजनों की रक्षा के काम में असफल रही है। हो सकता है, कि इस आरोप के पीछे कुछ सदस्यों का राजनीतिक उद्देश्य हो, किंतु इससे आरोप को बिल्कुल बे-बुनियाद नहीं कहा जा सकता और उसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती। राज्य मंत्री ने भी इस आरोप के जवाब में यह कहा है कि हरिजनों को अत्याचारों से बचाने के लिए सरकार कदम उठा रही है। उन्होंने यह भी कहा कि जहां कहीं से अत्याचार की शिकायतें आ रही हैं जांच-पड़ताल की जाती है और अपराधियों को दंडित भी किया जाता है। सरकार इस संबंध में कितनी जागरूक है उसके लिए उन्होंने गुजरात सरकार का यह उदाहरण पेश किया कि उसने अपने यहां पर आदेश जारी कर दिया है कि हरिजनों की सुरक्षा के लिए जिलाधिकारी जिम्मेदार ठहराये जाएं। यह सब सही है कि केंद्र सरकार ने इस सिलसिले में आवश्यक सम्पर्क रखा है। किंतु यह साफ है कि हरिजनों के संरक्षण का काम पूरी सावधानी और जागरूकता से नहीं हो रहा है। केवल हांथ रस का कांड ही उसका उदाहरण नहीं है। स्वयं राज्य मंत्री का इस प्रसंग में जो वक्तत्व राज्यसभा में रखा है उससे भी इसकी पुष्टि होती है।

राज्य मंत्री के वक्तत्व में कहा गया है कि सन् 1969 से 70 के वर्ष में हरिजनों पर अत्याचार की विभिन्न राज्यों में 1541 घटनाएं घटीं, आदिवासियों पर जो अत्याचारों में कितना भयंकर रूप धारण किया कि वह इस बात से साबित हो जाता है कि कई प्रदेशों में हरिजनों को जिन्दा जलाया गया और उनके घरों में आग लगा दी गयी। शेष मामले ऐसे हैं जिनमें या तो उनकी जमीनों पर कब्जा कर लिया गया था या उन्हें अन्य प्रकार से अपमानित किया गया। इन में मारपीट, बलात्कार आदि भी शामिल हो सकते हैं। वक्तत्व में राज्वार ब्योरा दिया गया है और बताया गया है कि किस राज्य में कितनी घटनाएं हुई। क्या इसके बाद भी हरिजनों पर अत्याचार की सत्यता में कोई संदेह रह जाता है। वक्तत्व में यह भी बताया गया है कि सरकार ने इन मामलों के सिलसिले में क्या कदम उठाएं । पर यह सब कानून से तब तक कोई फायदा नहीं जब तक यह सिद्ध नहीं होता कि हरिजनों पर अत्याचार की घटनाएं अब कम हो रही हैं। फिर बहुत से मामले ऐसे भी हैं जिनमें कोई कानूनी कार्यवाही नहीं की जा सकी । अकेले मध्य प्रदेश में 40 मामले ऐसे हैं जिन पर राज्य सरकार कोई उचित कार्यवाही नहीं कर सकी। ऐसी सूरत में अत्याचार करने वालों का हौंसला बढ़ेगा तथा हरिजनों का प्रशासनिक जागरूकता से विश्वास खत्म होता जाएगा। 

हिरजनों पर अत्याचार को रोकने के लिए कानून हो सकते हैं परंतु इन अत्याचारों से यह स्पष्ट है कि एक तो उन कानूनों की बिल्कुल परवाह नहीं की जाती और दूसरे पुलिस एवं प्रशासन दोनों उन पर अमल करवाने के लिए बहुत सतर्क नहीं हैं। पुलिस के संबंध में तो यह आरोप लगया गया है कि किन्हीं मामलों में पुलिस की मिली भगत से अत्याचार हुए हैं। कुछ भी हो यह बहुत चिंता की बात है और इसे रोकने के लिए तुरंत जोरदार कदम उठाए जाने की जरूरत है। यह सही है कि केवल कानूनों के चलते हरिजनों के साथ भेदभाव एवं अत्याचार को नहीं रोका जा सकता। उसके लिए समाज में एक आवश्यक चेतना पैदा करने की जरूरत है, लोग यह समझे कि हरिजनों के अंदर भी वही खून है जो उसके अंदर है। इसके साथ ही साथ राज्य सरकार यह भी करे कि जिन कारणों से यह अत्याचार होते हैं उन्हें हटाया जाए। इस सिलसिले में यह सुझाव भी कम विचारणीय नहीं है कि जिन क्षेत्रों में हरिजनों पर अत्याचार हों वहां के समस्त लोगों पर दण्डात्मक कर लगाया जाए। इससे निश्चय ही अत्याचार करने वालों की हिम्मत टूटेगी और उन पर अंकुश लगेगा। 

वाक्यांश की पीडीएफ नीचे उपलब्ध है

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