100 WPM Hindi Dictation No. 53&54 from Ramdhari Gupta Volume – 1 for SSC, High Court

सभापति महोदय, हम सभी इस बात के शिकार हो जाते हैं कि अपने दल-गत स्वार्थ में आकर गलत काम कर बैठते हैं। कभी भाषा और कभी किसी प्रदेश के स्वार्थ में ऐसे प्रश्न उठते हैं, जो हमारे राष्ट्र की एकता को कमजोर करते हैं.

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सभापति महोदय, हम सभी इस बात के शिकार हो जाते हैं कि अपने दल-गत स्वार्थ में आकर गलत काम कर बैठते हैं। कभी भाषा और कभी किसी प्रदेश के स्वार्थ में ऐसे प्रश्न उठते हैं, जो हमारे राष्ट्र की एकता को कमजोर करते हैं। अभी एक माननीय सदस्य ने यह प्रश्न उठाया और आरोप लगाया कि भारत सरकार कुछ प्रदेशों के साथ इन्साफ़ नहीं करती। भारत सरकार कुछ प्रदेशों के प्रति पक्षपात-पूर्ण नीति अपनाती है। यही मनोवृत्ति है जिसमें एक प्रदेश को दूसरे प्रदेश के विरूद्ध भड़काया जाता है। एक जाति को दूसरी जाति के विरूद्ध खड़ा किया जाता है। एक धर्म को दूसरे धर्म के विरूद्ध खड़ा किया जाता है और एक भाषा और दूसरी भाषा वालों के बीच में भड़काव पैदा करके लड़ाई पैदा की जाती है। यही मनोवृत्ति है जिसको हमारे विरोधी दल के बहुत से लोग भड़काकर पैदा करते हैं। उनकी अपनी गलत नीतियों के कारण विशाल दृष्टिकोण नहीं होता है और वे ऐसे प्रश्नों को उभार कर अपना स्वार्थ सिद्ध करते हैं। स्पष्ट है कि ऐसे समस्त प्रश्नों का परिणाम हमेशा बुरा होता है। इसलिए मैं सभी राजनीतिक पार्टियों के नेताओं से अपील करना चाहूँगा कि जो प्रश्न हमारे देश के सामने हैं और जिन पर हम सबको चिंता हो रही है तथा जिनका हल निकालने की हम कोशिश करते हैं, उन तमाम प्रश्नों के ऊपर हम ठंडे दिल से विचार करें।

श्री वाजपेई ने एक अच्छी बात कही। उन्होंने कहा कि इन प्रश्नों का हल सड़कों पर नहीं होगा। मैं भी उनसे इस बात में सहमत हूँ कि इन प्रश्नों का हल प्रजातांत्रिक ढंग से ढूंढने का प्रयत्न करना चाहिए। हमें इनका हल प्रजातांत्रिक व्यवस्था के अंदर करना होगा। सड़कों के ऊपर इन प्रश्नों का हल नहीं हो सकता है।

राजस्थान के अंदर जो अकाल पड़ा हुआ है और लोग मर रहे हैं, उसकी तरफ चिंता नहीं हो रही है। अब राजस्थान में जो संकट है और इस तरह के जो दूसरे प्रश्न हैं, उन पर हम लोग एक साथ बैठकर गंभीरता से विचार करें और उनका हल तलाश करें। खाली इस तरह से आरोप लगाने से और उपदेश देने से काम नहीं चलेगा। इस देश के अंदर बंगाल में बाढ़ से जनता पीड़ित हो रही थी और उसको अनाज, कपड़ा और रोज़मर्रा की आवश्यक सामग्री भेजने की कोशिश हो रही थी।

  सभापति महोदय, उस ज़माने में रेलवे कर्मचारियों को भड़का करके, हड़ताल करना और फलस्वरूप एक ऐसी व्यवस्था पैदा करना, जिसके कारण बंगाल के पीड़ित लोगों की सहायता न की जा सके, उचित कार्य था। लेकिन यह कार्य मेरे घर के भाइयों ने किया था। मेरा कहना है कि केवल उपदेश से काम नहीं चलता है। जब ऐसी प्रश्न आएं तो उपदेशात्मक भाषाओं में ही फंसकर न रहा जाए बल्कि आवश्यकता है कि ऐसे प्रश्नों पर सारे राजनीतिक दल देश-हित को ध्यान में रखते हुए संजीदिगी से विचार करें और उन सबका हल तलाश करें।

आज श्री वाजपेई ने प्रधानमंत्री पर कुछ आक्षेप किये। वे बड़े गुस्से में थे और इतने क्रोध में थे कि उन्होंने अपने मस्तिष्क का संतुलन खो दिया था। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकारी कर्मचारियों के प्रयास से बड़ी-बड़ी सभाएँ की गयीं। मैं वाजपेई जी का गुस्सा और उनका असंतुलित होना समझ सकता हूँ। उन्होंने यह भी कहा कि प्रधानमंत्री जी ने इन चुनावों के बीच अपने भाषण में जन-मानस को ऊपर उठाने की कोशिश नहीं की। मूलभूत प्रश्नों को देश के सामने रखने की कोशिश नहीं की और आज जो राष्ट्रीय दिक्कतें और परेशानियाँ हैं, उन पर जनता को शिक्षित करने की कोशिश नहीं की।

  प्रधानमंत्री ने अपने चुनावी भाषणों में देश के अंदर जो शक्तियाँ राष्ट्रीय एकता को भंग कर रही हैं। धर्म के नाम पर, जाति के नाम पर, भाषा के नाम पर या क्षेत्रीयता के नाम पर संकीर्णता की भावना पैदा कर रही हैं, जनता को उनसे सजग किया। प्रधानमंत्री ने इस बात को अनुभव किया था कि उत्तर प्रदेश, बिहार और उत्तर भारत के समस्त हिंदी बोलने वाले इलाकों में जनसंघ संकीर्णता की भावना का प्रचार कर रहा है। जिस प्रकार से जनसंघ साम्प्रदायिकता की भावना को बढ़ावा दे रहा है, राष्ट्रीय शक्तियों को तोड़ने की नीति चला रहा है, उससे हमारे राष्ट्रीय मूल्य, राष्ट्रीय नीतियाँ और राष्ट्रीय एकता खतरे में हैं। इसीलिए प्रधानमंत्री ने जनसंघ के ऊपर इस बात का प्रहार किया था कि वह एक सांप्रदायिक शक्ति है और उससे जनता को सावधान हो जाना चाहिए। आज जो वाजपेई जी का गुस्सा है, उसको हम समझ सकते हैं। उन्होंने एक सपना देखा था। एक सुनहरा सपना। उत्तर प्रदेश में अपनी सरकार बनाने का , बिहार में अपनी पार्टी को बहुमत प्राप्त कराने का।

 

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SSC STENOGRAPHERS' ZONE (Virat)

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