उपाध्यक्ष महोदय, आप जानते हैं कि इस विधेयक पर आजकल जो बहस हुई है, उसमें हमने पूरा-पूरा विरोध किया है और इस सम्बन्ध में अपने तर्क पेश किये हैं। सरकार ने हमारे किसी भी सुझाव को स्वीकार करने से इन्कार कर दिया है। जहाँ तक इस कानून को अमल में लाने  का सम्बन्ध है, केन्द्रीय सरकार पूरे तौर पर राज्य सरकारों पर निर्भर है। मंत्री महोदय ने कहा है कि कई सूबों ने इस बारे में सहयोग देने का देने का आश्वासन दिया है।

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उपाध्यक्ष महोदय, आप जानते हैं कि इस विधेयक पर आजकल जो बहस हुई है, उसमें हमने पूरा-पूरा विरोध किया है और इस सम्बन्ध में अपने तर्क पेश किये हैं। सरकार ने हमारे किसी भी सुझाव को स्वीकार करने से इन्कार कर दिया है। जहाँ तक इस कानून को अमल में लाने  का सम्बन्ध है, केन्द्रीय सरकार पूरे तौर पर राज्य सरकारों पर निर्भर है। मंत्री महोदय ने कहा है कि कई सूबों ने इस बारे में सहयोग देने का देने का आश्वासन दिया है। लेकिन मैं जानता हूँ कि कई सूबों ने इस कानून का बहुत सख्त विरोध भी किया है। उनका कहना है कि केन्द्रीय सरका र को किसी भी तरह सहकारी क्षेत्र की संस्थाओं के सम्बन्ध में अपने अधिकार को प्रयोग करने का प्रयास नहीं करना चाहिए।

इस सुझाव को पेश करने में मेरा खास मकसद यह है कि अगर सरकार ने इस विधेयक को अमल में लाना ही है, तो फिर यह विधेयक पूरे देश में एक साथ अमल में आये और यह तमाम सहकारी बैंकों या सहकारी संस्थाओं पर एक-साथ लागू हो वरना, जिस सूबे की सरकार यह मान लेती है कि इस विधेयक को वहाँ पर अमल में लाया जाय, वहाँ की सहकारी बैंकों को प्रीमियम देना पड़ेगा। इसका परिणाम यह होगा कि यह नया बोझ उस सूबे के बैंकों पर नहीं पड़ेगा जिसकी सरकार इस विधेयक को मानने से इन्कार कर देती है।

मेरे इस सुझाव को स्वीकार करने का यह भी लाभ होगा कि अगर केन्द्रीय सरकार यह चाहती है कि इस कानून को किसी भी हालत में अमल में लाना चाहिए और सहकारी बैंकों में पैसा रखने वालों को कानून का संरक्षण देना चाहिए, तो उस पर भी यह बंधन रहेगा कि चूँकि उसने इस विधेयक को एक साल में अमल में लाना है, इसलिए यह जल्दबाजी करके इस विधेयक को पूरे देश पर एक-साथ अमल में ला पायेगी।

उपाध्यक्ष जी, यदि आधुनिक काल में विधानमंडलों का महत्व कुछ कम हो गया है तो उसका कारण यह है कि आधुनिक प्रशासन की समस्याएँ अत्यन्त जटिल हैं और विधानमंडल तथा विधायक इतने साधन सम्पन्न नहीं हैं कि विधान तथा नीति-निर्माण की समस्याओं पर गहराई से विचार कर सकें तथा प्रशासन की कारगर ढंग से निगरानी कर सकें। इसलिए यह माँग सर्वथा उचित है कि सचिवालयों की सेवाओं को उपलब्ध कराने की व्यवस्था अनिवार्य रूप से सरकार की ओर से होना चाहिए । एक विधायक या संसद सदस्य से यह आशा करना, कि वह अपने वेतन में से एक समर्थ व्यक्ति या विधि-विशेषज्ञ का खर्चा वहन कर सके, अव्यावहारिक है। विधान-सभाओं और संसद के सचिवालय पर सामूहिक रूप से प्रत्येक सदस्य का अधिकार होना चाहिए, चाहे वह शासक वर्ग का हो या विरोधी दल का। इस सिलसिले में आयोजित गोष्ठी में एक सदस्य ने यह भी सुझाव दिया है कि सदस्य केवल विधेयकों की भूमिका दें और इस ढाँचे को भरने का पूरा उत्तरदायित्व सचिवालय ले। मगर सचिवालय पर इतना निर्भर रहना भी कालांतर में निर्वाचित प्रतिनिधियों के अधिकारों को कर करना होगा।

दूसरा महत्वपूर्ण प्रश्न एक विधायक और विधानसभा के अध्यक्ष के सम्बन्धों का है। इत दिशा में पिछले कई वर्षों में ्नेक गलतफहमियाँ पैदा हो गई हैं। यद्यपि अध्यक्ष प्रायः शासक-वर्ग का ही एक सदस्य रहता है, फिर भी अध्यक्ष चुने जाने के बाद सामान्यतः उसका उत्तरदायित्व अपने दल के प्रति समाप्त हो कर उस प्रतिनिधि-सभा के प्रति हो जाता है जिसका नियमन करने के लिए उसे निर्वाचित किया हो। बदलते हुए राजनैतिक नक्शे के साथ-साथ यह जरूरी हो गया है कि विधानसभाओं और संसद में विभिन्न दलों की शक्ति में व्यापक परिवर्तन हो जाये। विरोधी-दल अब उतने कमजोर नहीं रहे हैं कि उनकी अवहेलना की जा सके। मगर साथ ही उनकी संख्या इतनी ज्यादा है और विचार-धाराएँ इतनी भिन्न हैं कि उनके लिए संसद और अनेक विधान सभाओं के बीच कोई प्रभावशाली और रचनात्मक कदम उठाने की हिम्मत नहीं है।

अध्यक्ष महोदय, आज सदन के सामने जो बाढ़ और चक्रवात के बारे में हम लोग बहस कर रहे हैं वह निश्चित रूप से देश के सामने एक महत्वपूर्ण सवाल है। उड़ीसा, बंगाल, आन्ध्र-प्रदेश, बिहार आदि सभी जगह बाढ़ आई है लेकिन यह उड़ीसा की बाढ़ की विशेषता है कि वहां पर बाढ़ के साथ चक्रवात भी हुआ।

वाक्यांश व उपयोगी शब्द

वाक्यांश
  1. उपाध्यक्ष महोदय
  2. आप जानते हैं
  3. विरोध किया है
  4. इस सम्बन्ध में
  5. पेश किये हैं
कठिन शब्द
  1. केन्द्रीय सरकार
  2. सहकारी क्षेत्र
  3. अमल
  4. सहकारी संस्था
  5. सहकारी बैंक
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